रतलाम जिला माहेश्वरी समाज से प्रेरणादायक खबर: संघर्षशील मां की बेटी ने एमबीबीएस डॉक्टर बनने का सपना किया साकार
रतलाम, मध्य प्रदेश। शहर से एक बेहद प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां एक मेहनतकश और संघर्षशील मां ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी सबसे छोटी बेटी को एमबीबीएस डॉक्टर बनाकर समाज के सामने एक मिसाल पेश की है।
अपनी मां और परिवार से मिले सहयोग के साथ-साथ अपनी कड़ी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के बल पर डॉ. खुशबू बाहेती ने आज डॉक्टर बनकर अपने परिवार और समाज के लिए यह उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। फोन पर बातचीत में उनकी माता, श्रीमती सरला दिलीप बाहेती ने बताया कि वर्ष 2015 में उनके पति के निधन के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया था। उस समय कई लोगों ने यह तक कह दिया था कि अब बेटी का डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह जाएगा, लेकिन उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद हिम्मत और जज़्बा बनाए रखा और और अपनी बेटियों की पढ़ाई जारी रखी। सबसे बड़ी बेटी ने एम. ए. (इंग्लिश) में, वहीं मंझली बेटी ने बीएड तक पढ़ाई किया है।
गौरतलब है कि श्रीमती सरलाजी बाहेती की केवल तीन बेटियां ही हैं। इसके बावजूद उन्होंने कभी बेटे की कमी महसूस नहीं की। उनके पति भी सिंगदाने-चने का ठेला लगाते थे, फिर भी उन्होंने बेटियों की पढ़ाई इंग्लिश माध्यम से करवाई। पति के निधन के बाद उन्होंने भी सिंगदाने-चने के साथ-साथ पापड़ बनाकर, खाना बनाकर और मेहनत-मजदूरी कर अपनी बेटियों की पढ़ाई जारी रखी और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया।
परिवार की इस सफलता में उनके दामादों का भी विशेष योगदान रहा। बड़ी बेटी के विवाह के बाद बड़े दामाद ने परिवार की जिम्मेदारियों में सक्रिय सहयोग दिया। इसके बाद दूसरी बेटी के विवाह के पश्चात दूसरे दामाद ने भी बेटे की तरह आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाई और सबसे छोटी बेटी खुशबू को डॉक्टर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उदाहरण दर्शाता है कि रिश्ते केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सहयोग की मजबूत नींव पर टिके होते हैं।
इस दौरान समाज और सरकार का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला। खुशबू मेधावी छात्रा थीं, जिसके कारण उनकी पढ़ाई की फीस सरकार द्वारा वहन की गई। वहीं माहेश्वरी महासभा के ट्रस्टों, विशेषकर बद्रीलाल सोनी शिक्षा सहयोग केंद्र एवं श्री कृष्णदास जाजू स्मारक ट्रस्ट का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।
माता श्रीमती सरलाजी बाहेती ने इस उपलब्धि के लिए सभी सहयोगकर्ताओं का आभार व्यक्त किया।
असल जिंदगी की यह कहानी एक मजबूत संदेश देती है कि बेटा नहीं होना कोई कमी नहीं है। यदि परिवार में दामाद भी बेटे की तरह जिम्मेदारी निभाएं और समाज एवं संस्थाओं का सहयोग समय पर मिले, क्योंकि सही समय पर मिला सहयोग किसी के जीवन की दिशा बदल सकता है और हर कठिनाई को पार कर मंजिल हासिल की जा सकती है।
आज के समय में, जब कभी-कभी नकारात्मक खबरें सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों पर सवाल खड़े करती हैं, ऐसे उदाहरण यह साबित करते हैं कि समाज का मूल स्वरूप आज भी आपसी सहयोग, संवेदनशीलता और रिश्तों की मजबूती पर ही आधारित है। नकारात्मक घटनाएं अपवाद हो सकती हैं, लेकिन ऐसे सकारात्मक उदाहरण समाज में विश्वास और प्रेरणा बनाए रखते हैं।

